Thursday, January 7, 2010

Hey Parth-Tum Idhar Kahan by Rakesh Kumar

हे पार्थ! तुम इधर कहां......................
दिल्ली के रामकृष्ण आश्रम मार्ग मेट्रो स्टेशन से कुछ ही फासले पर आरामबाग कॉलोनी है। इस आरामबाग में अवस्थित 'मातृछाया' सचमुच! कई अनाथ बच्चों को मां की ममत्व की छांव और आराम बड़े आराम-आराम के साथ दे रही है। वाकई! यहां जन्म देने वाली मां के वासल्य,प्रेम और ममत्व से दरकिनार व वंचित बच्चे "पालने वाले हाथ" का ममत्व पाकर कहीं ज्यादा खुश और किलकारियां भरते नजर आते हैं।

18 दिसंबर की संध्याबेला इन बच्चों के लिए कुछ खास थी क्योंकि बच्चों की किलकारियों को कहीं और ज्यादा गुंजायमान बनाने के लिए मातृछाया के सहयोग की खातिर तथा बच्चों की स्वास्थ्य जांच के लिए 'एक उड़ान -समाज का निर्माण' नामक समाजसेवी संस्था वहां निःशुल्क मेडिकल चेक-अप कैंप -'साप्ताहिक' की शुरुआत कर रही थी।

इस कार्य को बड़ी तत्परता और लगन से अंजाम दे रही थी-डा इन्दु बालान। चर्मरोग विशेषज्ञ डा बालान बच्चों(ज्यादातर 0-1 साल) को गोद में ले बड़ी प्रेम से पूरे शरीर को निहार कर मर्ज को जानने की कोशिश कर रही थी और उन्हें सहयोग कर थी-मातृछाया की दो आयाएं तथा एक उड़ान की दिल्ली इकाई की अध्यक्ष दीप्ति गौड।

सेवाभारती संस्थान द्वारा संचालित 'मातृछाया' में फिलहाल कुल 15 बच्चे हैं। इनमें 0-1 साल आयुवर्ग के 9 और शेष 6 बच्चे सात-आठ साल के करीब के हैं। पालने में झुलते इन नन्हीं किलकारियों को कहां पता कि उन्हें जन्म देने वाले मां-बाप किसी कारणवश बस! जन्म देने भर का ही फर्ज निभाया है और आगे का फर्ज मातृछाया की पालने वाली माताएं निभा रहीं और उन्हें चमात्कारिक खुशियां दे रहीं। यहां की झूलों पर मुस्कान बिखरती तपस्या, पवित्री, नेहा, पार्थ.........हम सभी का ध्यान अपनी ओर गोद में आने के लिए हाथ बढ़ाकर तो कभी किलकारियां भर कर और अदभूत चेहरे बनाकर कर खींच रहे थे। यहां आने पर पता चला कि मातृछाया की ममत्व की छांव देश की सीमा को लांघ चुका है और इसी का एक नजीर है-पार्थ। पार्थ नीग्रो मूल का अफ्रीकी बच्चा है और वह भी तमाम भारतीय बच्चों के साथ यहां किलकारियां भर रहा है तथा भारतीय संस्कारों में पल बढ़ रहा है।

मातृछाया संस्थान के मंत्री पवन बंसल ने बताया कि आज से तकरीबन 9 महीने पहले संस्था को एक अज्ञात व्यक्ति ने फोन पर सूचना दी कि मुखर्जी नगर गंदे नाले के किनारे किसी ने कंबल में लपेटकर एक बच्चा फेंक दिया है और यह बच्चा अफ्रीकी मूल का है। हमारी टीम फौरन वहां पहुंची और उसे यहां ले आई। आज हमारी खुशनसीबी है कि यह बच्चा 9 महीने का है और हमने इसका नाम-पार्थ रखा। पार्थ सभी बच्चों में सबसे ज्यादा भला-चंगा है।

इस संस्था में मां का फर्ज अदा कर रही आया कृष्णा कहती हैं कि यहां के सारे बच्चे हमारे जिगर के टुकड़े है, किन्तु हम पार्थ के परवरिश को लेकर कहीं ज्यादा उत्साहित हैं।

मातृछाया संस्था की सहमंत्री सुषमा मेहरोत्रा ने बताया कि डेढ़ साल तक के बच्चे को अक्सर घर मिल जाया करता है। अभी तपस्या को दिल्ली के एक निःसंतान दंपती गोद ले रहे हैं और हम उसकी गोद देने की वैधानिक सहित तमाम प्रक्रिया पूरी करने में लगे हुए हैं। इस संस्था के केयर टेकर राकेश कुमार जी का कहना है कि फिलहाल हमारी चिंता पार्थ को लेकर है क्योंकि विदेशी मूल के होने के नाते कोई भी भारतीय परिवार गोद लेने के लिए आगे नहीं आ रहा है। लेकिन उन्होंने यह भी बताया कि दिल्ली पुलिस में उच्च पदस्थ एक अधिकारी ने हमें आश्वस्त किया है कि अगर पार्थ को कोई भी गोद नहीं लेगा तो मैं उसे गोद लूंगा तथा भविष्य में मेरा जिगर का टुकड़ा देश का सर्वोतम एथलीट बनेगा।

संस्था के मंत्री पवन बंसल ने बताया कि यहां एकाध कैंप लगाने वाले और फोटो खिंचवाने के लिए तो काफी गैर-सरकारी संस्थाएं औऱ निजी अस्पतालों के लोग आते हैं और अपना प्रोफाईल बढ़ाकर चले जाते हैं, किन्तु कोई भी हमें लंबे समय तक मेडिकल सहयोग का आश्वासन नहीं देता, उलटे निजी अस्पतालों में बच्चों को बीमारी की हालात में दाखिला कराने पर वे हमसे काफी बेरहमी से पैसे वसूल लेते हैं।

इस कार्यक्रम में यह देखकर सबसे ज्यादा खुशी हुई कि एक निजी टीवी चैनल भी इस प्रोग्राम को कवर कर रहा है, क्योंकि जहां तक मैं देखता हूं, उन्हें मसालेदार न्यूज की चाह ज्यादा होती है। जब इस बाबत मैंने चैनल के रिपोर्टर कपिल शर्मा से पूछा तो उन्होंने बताया कि यह सही है कि चैनल मसाला खबरें ज्यादा चुनती हैं, किन्तु मेरी विशेष रुचि समाज के इन रचनात्मक कार्यों को कवर करने में है।